उज्जैन : काल से महाकाल की यात्रा

“सौन्दर्य का साक्षात् रूप वसंतसेना, पौरुष का प्रतीक ब्राह्मण चारुदत्त… रात का एकांत, बाहर नगरी में चोर-लुटेरों का साम्राज्य… अत: दोनो ही भीतर रहने को विवश… काम का ऐसा बाण चला कि प्रथम मुलाकात में ही दोनों एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो गए !”

मृच्छकटिका The Toy Cart : शूद्रक (भाग 2)

इस कडी में इससे पूर्व प्रकाशित अंक

मृच्छकटिका The Toy Cart : शूद्रक (भाग 1)

जुआ, व्यापार तथा रास रंग में अपनी धन संपदा लुटा चुका चारुदत्त, अपने सम्बंधियो एवं मित्रों द्वारा इस विपत्ति काल में भुला दिए जाने पर अपनी दरिद्रता से खिन्न हो, अपने मित्र मैत्रय से इस दारुण स्थिति की चर्चा कर ही रहा है कि अचानक अपने समीप उसे भास हुआ किसी आहट का !

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उज्जैन : काल से महाकाल की यात्रा

“मद भरे नैन जैसे साक्षात् मोहिनी सम्मोहन का ही प्रतिरूप हो ! मुख का तेज ऐसा जैसे कि ओस की बूंदों में खिला हुआ कमल का फूल… पग बढ़ाने पर, हाथ और पाँव की थिरकन ऐसी, जैसे चलने में भी नृत्य की भंगिमाओं का संयोजन हो… पूरी देह दृष्टि नख से शिख तक अपूर्व सौन्दर्य में लिपटी हुई !”

उज्जैन : काल से महाकाल की यात्रा

मृच्छकटिका The Toy Cart : शूद्रक ( भाग 1)

प्रकृति ने सृष्टि को चलायमान रखने के लिए प्रत्येक सजीव प्राणी जगत में चेतना की शक्ति का संचार किया है । इस चेतना के विभिन्न रूप हैं जो भिन्न-भिन्न अवसरों के लिए इसे नाना प्रकार के रूपों में व्यक्त करते हैं । चेतना के इन अनेक रूपों में से एक महत्वपूर्ण रूप काम का भी है ।

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उज्जैन : काल से महाकाल की यात्रा

प्रतिकल्प, अर्थात जो फिर से जन्म ले स्वयं ही! एक मायावी फिनिक्स पक्षी की ही भाँति, जिसके बारे में यह मान्यता है कि जब उसका जीवन चक्र पूर्ण हो जाता है तो वह स्वयं ही जल कर मर जाता है !

आज की पोस्ट उज्जैन के विभिन्न नामों को समर्पित है, जो अलग अलग कालखण्डों तथा विजयी राजाओं द्वारा इस नगरी को दिए गए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भले ही इस नगरी को किसी भी काल में किसी भी नाम के द्वारा जाना गया हो, परन्तु इससे इसके महत्व, इसकी रहस्यमयता, वैभव, विद्वत्ता और साथ ही साथ इस नगरी के द्वारा तात्कालिक एवम् भविष्य की घटनाओं पर इस नगरी के द्वारा डाली गई अमिट छाप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सीधे और सपाट शब्दों में हम इसे इस तरह से भी व्यक्त कर सकते हैं कि इस नगरी की कीर्ति हर युग में अक्षुण ही रही है। Continue reading “उज्जैन : काल से महाकाल की यात्रा”

तू जहाँ जहाँ रहेगा…. ~~ by a s pahwa भाग 3

भाग 3

इसी कड़ी में पूर्व प्रकाशित अंक

तू जहाँ जहाँ रहेगा….  भाग 1

तू जहाँ जहाँ रहेगा….  भाग 2

 

ऐसा नही था कि राधिका किस व्याधि अथवा मनोग्रन्थि से पीड़ित है, अपने स्तर पर किशन ने जानने का प्रयत्न नहीं किया था। यदि पति-पत्नी समझदार हों तो दोनों एक दूसरे के ऐसे मित्र हो सकते हैं जिसके आगे दुनिया का कोई भी रिश्ता और मित्रता की कसौटी ठहर नही सकते। कमरे से बाहर उसने अपनी पत्नी से पूछने का अनथक प्रयत्न किया,परन्तु जैसे ही वह इस प्रंसग को छेड़ने का प्रयत्न करता, राधिका इस घटनाक्रम से बचना चाहती। एक घबराहट के अलावा वो कुछ कह नही पाती थी। Continue reading “तू जहाँ जहाँ रहेगा…. ~~ by a s pahwa भाग 3”

तू जहाँ जहाँ रहेगा…. ~~ by a s pahwa भाग 2

भाग 2
 इस कड़ी में इससे पूर्व 
खेत में जहाँ, बड़े भाई प्रदीप ने छोटे भाई किशन को भेजा था, तुरन्त ही वहाँ पहुंचा। देख कर उसे झटका सा लगा कि 4दिन पहले का नवविवाहित भाई, निराशा और परेशानी के गर्त में डूबा सा अपने खेत की एक मुंडेर पर गुमसुम सा बैठा है और यूँ ही निरुद्देश्य मिटटी के ढेले आस पास से उठा-उठा कर बेध्यानी में खेत में फेंक रहा है। दीन दुनिया से बेखबर!

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तू जहाँ जहाँ रहेगा…. ~~ by a s pahwa भाग 1

भाग 1

क्या वास्तव में भूत प्रेत जैसी कोई चीज़ होती है या फिर यह मानव मात्र के डर से उपजी केवल एक कल्पना मात्र ही है | सही सही कहना तो असम्भव है, क्यूंकि विज्ञान केवल प्रत्यक्ष को मानता है जिसे तर्क की कसौटी पर कसा जा सके | परन्तु यह भी एक वास्तविकता है कि विज्ञान केवल लौकिक जगत की विद्या को पहचानता है| एक चिकित्सक की शरीर के आंतरिक अंगों सम्बन्धी जानकारी उस जगह पर समाप्त हो जाती है, जो उसके एक्स-रे अथवा स्कैन में नहीं आती | यह विज्ञान का एक अंतिम चरण है कि परोक्ष नहीं, वह उपस्थित नहीं! परन्तु आधात्मिकता के स्तर पर शरीर में आत्मा भी है जो किसी भी वैज्ञानिक यंत्र में नहीं आती, तो क्या उसका अस्तित्व भी नकार दें? Continue reading “तू जहाँ जहाँ रहेगा…. ~~ by a s pahwa भाग 1”

चोखी-ढाणी, पुलिया और राम-राम सा का देस: जयपुर

भाग 3

ढेर सारी खरीदारी और पेट भर कर खाने के बाद, बाज़ार से निकल कुछ दूर जाने का मन कर गया तो हम निकल पड़े टोंक की तरफ, यहाँ हमे संगमरमर की मूर्तियाँ बनाने वाली एक वर्कशॉप मिली, जिनके द्वारा बनायी गयी अनेको शिल्प कृतियों का प्रयोग कई बालीवुड फिल्मो और टीवी धारावाहिकों में हो चुका है, देश-विदेश के कई मन्दिर तथा अन्य उच्च आय वर्ग के लोग भी अपने पूजा घरों के लिये यहाँ से मूर्तियाँ बनवाते हैं, जिनकी कीमत लाखों तक में होती है | अब समय था, अपने लिए भी यहाँ से कुछ खरीदारी करने का ! Continue reading “चोखी-ढाणी, पुलिया और राम-राम सा का देस: जयपुर”